Sunday, December 15, 2013

बीबी की डांट या कचहरी

भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना- कचहरी न जाना
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे

Monday, April 15, 2013

हमारे देश की न्यायपालिका और नेता


एक- यदि हम अधिक पीछे न जायें तो जून 1975 में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने श्रीमती गांधी को चुनाव में भ्रष्‍ट आचरण का दोषी पाकर छह सालों के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्‍य ठहरा दिया था। न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ “प्रायोजित प्रदर्शन” करवाये गये। जज का पुतला जलाया गया। श्रीमती गांधी ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय में फैसले के खिलाफ अपील की। उनके वकील ने न्‍यायालय से कहा, ‘’सारा देश उनके (श्रीमती गांधी के) साथ है। उच्‍च न्‍यायालय के निर्णय पर ‘स्‍टे’ नहीं दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।” सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सशर्त ‘स्‍टे’ दिया। देश में आपात स्थिति लागू कर दी गई, हजारों लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया। चुनाव-कानूनों में इस प्रकार परिवर्तन किया गया कि जिन मुद्दों पर श्रीमती गांधी को भ्रष्‍ट-आचरण का दोषी पाया गया था वे आपत्तिजनक नहीं माने गये, वह भी पूर्व-प्रभाव के साथ। कहा गया कि तकनीकी कारणों से जनादेश का उल्‍लंघन नहीं किया जा सकता। “तथाकथित प्रगतिशील” लोगों ने इसकी जय-जयकार की, उस समय किसी को न्यायपालिका के सम्मान की याद नहीं आई थी।

दो- कई वर्षों की मुकदमेबाजी तथा नीचे के न्‍यायालयों के कई आदेशों के बाद आखिरकार 1983 में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने आदेश दिया कि वाराणसी में शिया-कब्रगाह में सुन्नियों की दो कब्रें हटा दी जायें। उत्तर प्रदेश के सुन्नियों ने इस निर्णय पर बवाल खड़ा कर दिया, हमेशा की तरह। उत्तर प्रदेश की सरकार ने कहा कि न्यायालय का आदेश लागू करवाने पर राज्य की शांति, व्यवस्था को खतरा पैदा हो जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही आदेश के कार्यान्वयन पर दस साल की रोक लगा दी। लेकिन संविधान के किसी “हिमायती” ने जबान नहीं खोली।

Friday, February 15, 2013

दो बिलखते मासूमों का जीवन

एक खबर को याद करके आँखें धुंधली हो जातीं हैं. आज मैं उसी घटना का ज़िक्र यहाँ करने जा रहा हूँ. जिसे मैं आज तक नहीं भूल सका हूँ.  खबर राजस्थान की एक जेल की थी. जहाँ दो मासूम बच्चे अपने उन माँ-बाप की ग़लती की सज़ा काट रहे हैं, जो अपने वतन को प्यार करते थे. प्यार कैसा भी हो अंजाम अक्सर दुखद ही होता है. उन मासूमों के माँ-बाप भी इसी प्यार की भेंट चढ़े. उन बच्चों में एक लड़का है और एक उसकी छोटी बहन. ये दोनों बच्चे अपने माँ-बाप के साथ बांग्लादेश में आराम से रहते थे. जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ थीं. उनके माँ-बाप बांग्लादेश में रहते थे, लेकिन वे थे पाकिस्तानी, जो विस्थापित होकर यहाँ आए थे. उनके दिल की एक तमन्ना थी वे ज़िंदगी के बाकी दिन अपने वतन में गुज़ारें.

Saturday, December 15, 2012

रेप की सजा महज दो थप्पड़

अमरोहा, यू पी से  मुझसे  मिलने  आनंद  प्रकाश  जी  आये  और  एक  प्रकरण  में  मुझसे  मदद  मांगी,  जो  उन्होंने  कहा  वो  आप   से  शेयर  कर  रहा  हूँ.  

श्यामपुर  गाँव  के  मजबूर  शफरू  की दास्तान कोई  नहीं  सुनता क्योंकि  वो  साधनहीन  है, शफरू  की  नन्ही  सी  बेटी  के  साथ  रिजवान  नाम  के  लड़के  ने  गाँव  में  ही  रेप  किया और  उसके  बाद  किसी  को  न  बताने  की  धमकी  देकर  भगा   दिया. किसी तरह का कोई केस भी शायद ही दर्ज  हुआ होगा. बेचारी  डरी-सहमी  बच्ची  ने  तब  तक  किसी  को  कुछ  भी  नहीं  बताया  जब  तक  की  उसकी  तबियत  खराब  नहीं  हो   गयी. हद  तो  तब  हो  गयी  जब  उसे  इलाज   या  सहायता   के  लिए  गाँव  से  बाहर  जाने  से  भी  रोका  गया  और  सारी  बात  पंचायत  में  ही  निपटाने  के  लिए  ( वस्तुत: जबरदस्ती )  मनाया  गया. सवाल  हुक्का-पानी  बंद  होने  का  आया  तो  बाकि  परिवार  की  सोच  कर  बेचारा  शरफू चुप  रह  गया. मायावती  का  राज  कितना  दबंग  है , या मजबूर है  इसका  इल्म  मुझे  तब   हुआ  जब  पंचों का  फैसला  आया. रिजवान  को  आरोपी  तो  माना  गया  और  सजा  भी  तजवीज़  की  गयी, और  कोई   छोटी-मोटी सजा  नहीं पूरे दो थप्पड़.

एक  नन्ही  सी  बच्ची  के  दर्द  को  ये  समाज  कब  समझेगा ?
क्या  ये  पंचायतें  कभी  औरत  को  इंसान  समझेंगी ?

Thursday, December 15, 2011

एक चांटा और अन्ना का नया गांधीवाद

अन्ना हजारे और शरद पवार की राजनीतिक दुश्मनी पुरानी है,  आलम यह कि जब अन्ना हजारे अप्रैल में दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे तो उन्होंने उस कमेटी में भी शरद पवार का रहना मंजूर नहीं किया जिसे संयुक्त रूप से जनलोकपाल विधेयक पर चर्चा करने के लिए बनाया  जा रहा था. शायद इसी  कारण  जैसे ही अन्ना हजारे को पता चला कि शरद पवार को किसी ने चांटा मारा है तो वे अपनी खुशी छिपा नहीं सके और तुरंत पूछ बैठे:

क्या बस एक ही चांटा मारा है ?

उनकी इस चुटकी का वहां मौजूद लोगों ने हंसकर और तालियां बजाकर समर्थन भी कर दिया. अन्ना वहां से तो चले गये लेकिन थोड़ी ही देर में उन्हें अहसास हो गया कि यह तो उनके गांधीवादी चरित्र पर धब्बा बन जाएगा,  इसलिए लीपापोती शुरू कर दी. गांधी के फोटोकापी होने का दावा करनेवाले अन्ना पर सबसे तीखा प्रहार गांधी खानदान के तुषार गांधी ने यह कहते हुए किया है कि हो सके तो अब अन्ना हजारे राजघाट न जाएं.

Tuesday, November 15, 2011

बहुत दर्द होता है, हम जैसे मत बनिये

मेरा जीवन  यात्राओं, थकान, उलझनों, खुशियों और तनावों में डूबता-उतराता रहा  है, आज  अस्पताल में बैठा मैं अपना एक ठिकाना सा खोज रहा हूँ, अपने जीवन का मंतव्य क्योंकि आज ना तो न कोई ठौर है ना स्थायी ठिकाना... साथ में माँ है, जीवन में हमेशा सही को सही और गलत को गलत कहने वाली मेरी तार्किक आलोचक और मेरे कारण बेहद परेशान रहकर भी मुझसे मिलने पर हमेशा मुस्कुरा कर अपना दर्द छुपाने वाली मेरी सबसे सशक्त मित्र भी. मैं अपनी भावुकता को संभालते हुए कहना चाहता हूँ कि बहुत ऊब होती है अब, यहाँ सिर्फ पैसा है, दिखावा है, यह किसी दूसरी  दुनिया सा प्रतीत होता है राजनीति, हिंसा और  उत्पीडन पर्यायवाची से प्रतीत होते हैं.

Thursday, September 15, 2011

अन्ना, हम और वन्दे मातरम्

पहली बार थोड़ी सी जनता ने तंत्र को लोकतंत्र  सिद्ध किया है. आजादी के चौंसठ साल तक सरकार ज्यादातर जन आंदोलनों की उपेक्षा और बेइज्‍जती करती रही, चाहे वो ट्रेड यूनियन के मजदूर हों, किसान हों, आदिवासी हों या अन्य कोई भी आंदोलन… सबको सरकार लाठी और बंदूक से दबाती रही. आज वही सरकार  हाथ जोड़ कर आंदोलन का आदेश मानने को तत्पर दीख रही है.

जनता जहां खड़ी है सफर तो वहीं से शुरू करना पड़ेगा. नि:संदेह जनता की अपनी एक समझ है साहब, हम तथाकथित अक्लमंद प्रगतिशील लोग उसे कहीं बहुत ऊंचा देखना चाहते हैं पर वो हमारी बात समझती नहीं और समझे भी कैसे ?

Monday, August 15, 2011

अब हमें चूसा जाएगा

एशियन  वेल्थ  मार्केट  के  अनुसार  दस  लाख  डालर  की  न्यूनतम  निवेश  क्षमता  वाले  भारत  में  1,73,000 लोग  हैं  जिनकी  कुल  संपत्ति  मात्र  42 लाख  करोड़  रूपये   है,  लगभग  950 अरब  डालर.

सम्भावना  है  कि 2015 तक  ये  संपत्ति   बढ़कर  2465 अरब  डालर  यानि 1,00,00,000  करोड़  रूपए  होगी.  ऐसे  महानुभावों  की संख्या  भी बढ़कर  हो  जाएगी  4,03,000. अब  सीएलएसए के  मुताबिक  तेज  आर्थिक  वृदि और  शानदार  मुनाफे  के  चलते  भारत  में  संभावनाएं  बहुत  हैं.

हमारे प्यारे  प्रधानमंत्री  कहते  हैं  कि हमारी  महंगाई  इसलिए  बढ़  रही  है  क्योंकि  हम  खाते  बहुत  हैं,  क्रय  क्षमता  बढ़  गयी  है  और साथ ही बढ़ गयी है हमारी आमदनी  इसलिए हमारी कीमतें कम करने की मांग स्वीकार करना तो जरा मुश्किल है. ज्यादा जरुरी है विदेशी पूंजी निवेश की आकर्षित करना और देश की आर्थिक  विकास दर को बढाकर आठ प्रतिशत तक ले जाना.

Friday, July 15, 2011

राजनीति: एक साल की कमाई मात्र 8 अरब रुपये

भारत में लोग बेहद गरीब हैं, लेकिन यहां की राजनीतिक पार्टियों के पास अगाध पैसा है. लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, विपक्षी पार्टी बीजेपी और उत्तर प्रदेश में शासन कर रही बीएसपी की एक साल की कमाई के आगे भारत पर वर्षों राज करने वाली ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियां कहीं भी नहीं टिकती हैं. भले ही ब्रिटेन का जीडीपी (सकल घरेलू उत्‍पाद) भारत से दोगुना है, वहां का हर नागरिक औसतन एक भारतीय से 30 गुना ज़्यादा कमाता है, लेकिन भारत की तीन प्रमुख सियासी पार्टियों की आमदनी ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियों की तुलना में 150 गुना से भी ज़्यादा है.

वित्त वर्ष 2008-09 में कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी की साझा आमदनी करीब 786.62 करोड़ रुपये (करीब 8 अरब रुपये) रही, जबकि ब्रिटेन की तीन प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- लेबर, कंजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी - ने वित्त वर्ष 2009-10 में महज करीब साढ़े पांच करोड़ रुपये (पाउंड स्टर्लिंग की आज की दर के आधार पर) जुटाए.

Sunday, May 15, 2011

इंडियन पेनल कोड 498A और एक्ट 46

" Whoever, being the husband or the relative of the husband of a woman, subjects such woman to cruelty shall be punished with imprisonment for a term which may extend to three years and shall also be liable to fine. The offence is Cognizable, non-compoundable and non-bailable."

Please read the Act 46 of 1983 to understand 498A better.

How are you at risk and why it is dangerous for the society ?

Your wife/daughter-in-law who's demands are not met can make a written false complaint of dowry harassment to a nearby police station. The husband, his old parents and relatives are immediately arrested without sufficient investigation and put behind bars on a non-bailable terms. Even if the complaint is false, you shall be presumed guilty until you prove that you are innocent.

498A can only be invoked by wife/daughter-in-law or her relative. Most cases where Sec 498A is invoked turn out to be false (as repeatedly accepted by High Courts and Supreme Court in India) as they are mere blackmail attempts by the wife (or her close relatives) when faced with a strained marriage. In most cases 498A complaint is followed by the demand of huge amount of money (extortion) to settle the case out of the court.

This section is non-bailable (you have to appear in court and get bail from the judge), non-compoundable (complaint can't be withdrawn) and cognizable (register and investigate the complaint, although in practice most of the time arrest happens before investigation). There have been countless instances where, without any investigation, the police has arrested elderly parents, unmarried sisters, pregnant sister-in-laws and even 3 year old children. In these cases unsuspecting family of husband has to go through a lot of mental torture and harassment by the corrupt Indian legal system.

A typical case goes on for years, approximately 5-7 years and the conviction rate is about 2% only. Some accused parents, sisters and even husbands have committed suicide after time in jail.

Penalty for giving or taking dowry
Any person, after the commencement of this Act, gives or takes or abets the giving or taking of dowry, he shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than (Act 43 of 1986, Sec.3)  five years, and with fine which shall not be less than fifteen thousand rupees or the amount of the value of such dowry, whichever is more. Section 3 re-numbered as sub-section (1) thereof by Act No.63 of 1984, sec.3

Passed by Indian Parliament in 1983, IPC 498A is a criminal not a civil law.